ये लहरें

अक्टूबर 10, 2013

ये लहरें

समुद्र के किनारे पर खड़ा मैं सोचता रहा “ओ लहरों , इतना वेग कहाँ से आता है ? इतना गुस्सा कौन देता है तुमको ?”
फिर अपने आप ही उत्तर मिल गया “अपने आप ही आता होगा गुस्सा इन लहरों को । कईं कईं मीलों दूर से चलकर आते हुए एक दिशाहीन अनिश्चित गंतव्य की ओर जाते हुए अपने आप ही झुंझला जाती होंगी ये लहरें और क्रोध में सामने जो भी खड़ा हो उस पर भरपूर ताकत से वार कर के अपनी भड़ास निकालती होंगी ।
लेकिन क्रोध कब कहाँ किसी का भला कर पाया है ?
जितनी बार सामने आने वाले अवरोधकों से टकराती हैं अपनी ताक़त खोती रहती है ये लहरें ।
कईं बार टकराती हैं चट्टानों से जो लहरों के पुरजोर बल का वार सह कर भी टस से मस नहीं होती । अपनी पूरी शक्ति की ऐसी हार शायद लहरें बर्दाश्त नहीं कर पाती और चट्टानों से टकराने पर पूरी तरह से टूट जाती हैं और छोटी छोटी बूंदों में बदल जाती हैं । इनमें से अधिकतर बूँदें उसी चट्टान पर गिर जाती हैं किसी पराजित राज्य की प्रजा की तरह मानो समर्पण कर रही हों, जिसकी सेना एक भीषण टक्कर में ध्वस्त हो गयी ।
कईं बार ये लहरें टकराती है किनारे के निकट खड़े मेरे जैसे और भी कईं इंसानों से । एक के बाद एक कईं इंसानों को टक्कर देती हुई, अपनी झुंझलाहट उनपर निकालती हुई थकती रहती है और अंत में थक कर चूर हो जाती है और पानी की धारें बनाकर आखिरकार भूमि पर बिछ जाती हैं ।
वह समझती है कि वह हार गई । जिस उद्देश्य से चल रही थी उसको पूरा नहीं कर पाई । अपनी असफलता का गुबार दूसरों पर निरर्थक रूप से निकाल कर खुद बरबाद हो गई । लेकिन शायद वो नहीं जानती कि जहां पहुँच कर उसने दम तोड़ा वास्तव में वही उसका गंतव्य था जिसे दुनिया किनारा कहती है ।
जानती तो वो अवश्य कहती “ये ? ये था मेरा गंतव्य ?? इसके लिए मैं इतने मीलों दूर से चल रही थी ? इसके ना मिलने के कारण मैं झुंझला रही थी ?? धत तेरे की, व्यर्थ ही गया ये जीवन तो !!
इस गंतव्य पर पहुँचने से अधिक आनंद तो इसकी यात्रा में था । मैंने क्रोध में चट्टानों को, लोगों को मारा । अपना गुस्सा उनपर निकाला । लेकिन देखो, मैं तो अपना गुस्सा निकालती रही और जाने अनजाने उन्ही की शोभा बढ़ाती चली गयी । किन्ही चट्टानों पर मेरी बिखरी बूंदों पर जब सूरज की रोशनी पड़ती है तो वे चमक उठती हैं । चट्टान चाहे तो उसे अपना आभूषण मान सकती है जैसे कोई राजा स्वयं द्वारा पराजित राजाओं के मुकुट अपने चरणों में रखना अपनी शान समझता है । चलो, मेरा अपरिपक्व गुस्सा किसी के तो काम आया ।
और जब मैं गुस्से में टकराती रही उन बहुत सारे मनुष्यों से तो वे लड़खड़ाते फिर सँभालते और फिर ठहाके मार के हँसते । मेरा गुस्सा, और उनका मनोरंजन । चलो मेरा गुस्सा किसी के काम तो आया ।

आज मैं किनारे पर इन बिछ चुकी लहरों को देखता हूँ कि कितनी सुन्दर दिखती हैं ये । सूरज की रोशनी में अपने साथ गीली मिटटी को भी चमका रही हैं ये । आस पास बहुत सारे लोग, बच्चे, बड़े सभी उसी मिटटी से अपना घर बनाते हैं । कोई इन लहरों के वर्षों की यात्रा में इनके साथ बह आए सीप और मोतियों को चुग रहा होता है । मानो लहरों के मिटने के बाद उसकी वसीयत बांटी जा रही हो ।

लेकिन सबसे बड़ी विडम्बना है ये की जब थक कर चूर होती हुई अपने गंतव्य को पहुँच कर लहरें जब बिखर जाती हैं तो अनजाने में ही कईं लोगों के बनाए हुए मिटटी के घर तोड़ देती है । तब लोग गुस्से में लहरों को गालियाँ देते हैं ।

तब लहरें थकी मुस्कराहट के साथ कहती होंगी “जब मैं सच में गुस्से में थी और तुम पर वार कर रही थी और अपनी असहाय अवस्था से झुंझला रही थी तब तो तुम इसे अपना मनोरंजन मान रहे थे और अब जब मैं थक कर चूर हो रही हूँ तब तुम मुझ पर गुस्सा कर रहे हो कि मैंने तुम्हारे मिटटी के घर तोड़ दिए !!

जानती हूँ कि ये घर तुम्हारे लिए भविष्य की आशाएं हैं । मैंने भी आशा की थी कि मैं अपने गंतव्य पर पहुंचूंगी लेकिन आज जब पहुंची हूँ तो ये सब कितना निरर्थक लग रहा है । आज मैंने जान लिया कि आशाओं के साथ जीवन जीने में जो आनंद है वो उन आशाओं के पूरा होने के बाद भी नहीं मिलता । लेकिन आशाएं इतनी कमजोर भी ना बनाया करो की थकी लहरों की ही मार ना सह पाएं । ”

ऐसा ही और भी बहुत कुछ है जो वे लहरें बता गईं लेकिन इस समय याद नहीं । शायद मैं भी अब अपने गंतव्य के बारे में सोच रहा हूँ ।

-मृनाल

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नाबाद

अप्रैल 21, 2010

“ए तू आउट है ”

“नही ये वाइड बाल है”

“कोई वाइड बाल नही है, तू आउट है ला बैट दे..”

“नही दूंगा, मैं आउट नही हूँ..”

जब बाहर हो रहा हो हल्ला बहुत बढ़ गया तब किशोरीलाल जी से रहा नही गया और वे अपने छड़ी उठाये घर से बाहर आ गए |

“क्या हल्ला मचा रखा है ये” उन्होंने अपने घर का दरवाज़ा खोलते हुए कहा “क्या हो रहा है….”

उनको छड़ी उठाये बाहर आते देख कर बच्चे आपसी मन मुटाव भुला कर उनकी और देखने लगे | ‘आज शामत आ गयी’ उन्होंने सोचा |

“क्या कोई और काम नही है तुम लोगो को ?” किशोरीलालजी ने कहा “जब देखो तब ये गिल्ली डंडा उठाये चले आते हो ?”

सभी बच्चे सर झुकाए खड़े थे | उनमे से एक ने सर उठा कर कहा “गिल्ली डंडा नही क्रिकेट ”

“हाँ हाँ वही” किशोरी लालजी ने मुंह बिगाड़ते हुए कहा | “चलो भागो यहाँ से, अब शोर शराबा किया तो तुम्हारे माँ बाप से शिकायत कर दूंगा |”
सभी बच्चे मन में बडबडाते हुए वहां से चले गए |

किशोरिलालजी ने भीतर से दरवाज़ा बंद करते हुए कहा “ना जाने कैसे इनके माँ बाप इन्हें यूं खुला छोड़ देते हैं ? रिटायर आदमी को परेशानी हो सकती है इसकी किसी को कोई परवाह नहीं |”

“क्यों बच्चों पर इतना बिगड़ते हो?” किशोरिलालजी की पत्नी शान्ति ने कहा | वो अपना पल्लू सीधा कराती हुई ड्राइंग रूम में जा रही थी |

“अब तुम कहाँ जा रही हो?” किशोरिलालजी ने कहा “और ये बैंगनी रंग की साडी क्यों पहनी है?”

“अच्छी है ना?” शान्ति ने कहा “बिल्कुल माताजी की तरह ?”

“कौन माताजी ?” किशोरिलालजी ने कहा “वो सीरियल वाली?”

शान्ति ने मुस्कुराते हुए हाँ में सर हिलाया |

“हे भगवान” किशोरिलालजी ने कहा “अब यही बाकी रह गया है | उस सीरियल में जो वो आती है ना, क्या नाम है उसका, हाँ मिनी, उसकी तरह अब मिनी स्कर्ट पहनना भी शुरू कर दो |”

“हम्म” शान्ति ने मुस्कुराते हुए कहा “मतलब आप भी देखते हो |”

“अरे जब दिन में तीन बार घर में यही कहानी दिखाई जाए तो कोई कैसे बच सकता है उससे” किशोरीलालजी ने कहा “कभी इतनी ही तल्लीनता से समाचार भी देख लिया करो | देश विदेश में क्या हो रहा है उसकी भी जानकारी ले लिया करो |”

“वह तो आप ही देखो” कहते हुए शान्ति ड्राइंग रूम में गयी और उसने टीवी ओन कर दिया और रिमोट से चैनल बदलते हुए अपना सीरियल वाला चैनल लगा दिया |

“वाह वाह” किशोरीलाल जी ने कहा “तुम्हारे पिताजी के घर में तो किसी को केलकुलेटर भी चलाना नही आता होगा | आज देखो कैसे फट फट रिमोट के बटन दबा रही हो |”

“आप भी सीख लो” शान्ति ने चिल्ला कर कहा “बहुत आसान है |”

“नही भाई” किशोरीलालजी ने भी चिल्ला कर कहा “ये सब काम तुम्हे ही मुबारक | हम तो हम भले हमारी तन्हाई भली | शर्माजी हमेशा कहते थे की काम वही करो जो करने के लिए पैदा हुए हो | ये टेक्नोलोजी वेक्नोलोजी हम लोगों के बस की बात नही | बेटा अमरीका पढ़ता है उनका फिर भी कोई चोंचले नहीं हैं उनके |” फिर उन्होंने देखा लेकिन इस बार शान्ति ने उनकी बात का कोई जवाब नही दिया | अब उसका सीरियल शुरू हो गया था |

“मैं बाज़ार जा रहा हूँ” कहते हुए किशोरीलाल जी ने अपनी छड़ी उठायी और अचकन पहनी “कुछ लाना है क्या ?”

शान्ति ने कुछ जवाब नही दिया | किशोरीलाल जी ने एक बार फिर से अपनी पत्नी की और देखा और फिर किवाड़ खोल कर बाहर चले गए |

अपने मौहल्ले की गलियों में चलते हुए किशोरीलाल जी ने आस पास झाड की तरह उग आये घरों की और देखा | जब वो यहाँ आये थे तब तो उनके घर के अलावा कोई और घर ही इस इलाके में नहीं था | धीरे धीरे शहर फैलता गया और लोग यहाँ आ आ कर बसने लगे |

और फिर गाड़ियों का शोर, लोगों का शोर, इस इलाके की शान्ति भंग कर दी | फिर धीरे धीरे खुल गए ये छोटे छोटे रेस्तरां और फिर ये कोफी के सेंटर, जहां लडके लड़कियां हाथों में हाथ डाले बेशर्मो की तरह बैठे रहते हैं |

किशोरीलाल जी चलते चलते गुम्मन मियाँ की दुकान पर आ गए |

“आईये किशोरीलाज जी” गुम्मन मियाँ ने कहा “कैसे मिजाज़ हैं ?”

“बस खैरियत है गुम्मन मियाँ” कहते हुए किशोरीलाल जी एक कुर्सी पर बैठ गए “एक चाय बना दीजिए गर्मागर्म |”

“अभी लीजिये” गुम्मन मियाँ ने कहा और चाय बनाने लग गए “वैसे, ऐसी गर्मी में भी आप गर्म चाय पीना नही छोड़ते |”

“अरे गुम्मन मियाँ” किशोरीलाल जी ने कहा “चाय की तो अब बात ही ना कीजिए | कभी कभी सोचते हैं की ये अंग्रेज़ सबसे बुरी खोज करके चले गए और लत हमें लग गयी | वरना गरमी तो बहुत ज्यादा ही बढ़ गयी है | लेकिन इस गरमी में भी ये मौहल्ले के बच्चे अपना क्रिकेट खेलना नही भूलते |”

“हाँ” गुम्मन मियाँ ने कहा “ये इस क्रिकेट का ही तो बुखार है की आजकल कोई यहाँ दुकान में आता नही | सब अपने घर में बैठे रहते हैं टीवी के पास |”

“अच्छा तभी यहाँ सुनसान रहता है |” किशोरीलाल जी ने कहा |

“अजी पूछिए मत किशोरीलाज जी” गुम्मन मियाँ ने कहा “नामुराद खेल है | दिन भर खराब करता है, खिलाड़ियों का भी और देखने वालों का भी |”

“लेकिन ये आजकल वाला तो बहुत छोटा होता है मैंने सुना” किशोरीलाल जी बोले “दो तीन घंटों में ख़तम हो जाता है |”

“हाँ हाँ” गुम्मन मियाँ ने कहा “बीस बीस ओवर का होता है | इंडिया आई पी एल नाम से होता है |” फिर हंसते हुए वे बोले “दुनिया भर के खिलाड़ी हिन्दुस्तान के लिए खेलने के लिए आते हैं, और हिन्दुस्तान के लिए ही नही हिन्दुस्तान के अलग अलग शहरों के लिए | हर शहर की अलग टीम है | खिलाड़ियों की नीलामी होती है |”

“क्या कह रहे हैं आप गुम्मन मियाँ?” किशोरीलाल जी ने कहा “हर शहर की अलग अलग टीम?”

“हाँ जी” गुम्मन मियाँ ने चाय का प्याला किशोरीलालजी के सामने रखते हुए कहा “बंगलौर टाइगर, राजस्थान रोयल, कोलकता का भी कुछ है, चेन्नई किंग, और मुंबई इंडियन…”

“क्या? मुंबई इंडियन?” किशोरीलालजी ने कहा |

गुम्मन मियाँ हंसने लगे “इससे ये तो पता चला की मुंबई इंडिया में ही है |”

“लेकिन गुम्मन मियाँ” किशोरिलालजी ने कहा “ये तो बहुत ताज्जुब की बात है | जहां सारे देश को एक होकर खेलना चाहिए वहां अपने अपने शहरों के लिए खेल रहे हैं? जानते हैं की जब अंग्रेज़ भारत छोड़ के गए थे तो यह कह गए थे की हम तो जा रहे हैं लेकिन इस देश में इतना अलगाव है की ये देश अपने आप ही टूट जाएगा | अब देखो…”

“ठीक कहते हो किशोरीलाल जी” गुम्मन मियाँ ने कहा “लेकिन कोई क्या कर सकता है | सारा हिन्दुस्तान पागल भी तो हुआ पड़ा रहता है इन खेलो के पीछे”

“बरबाद पीढी है ये” कहते हुए किशोरीलालजी ने पैसे गुम्मन मियाँ को दिए | फिर वे उस दुकान से बाहर निकल आये |

“तो आप भी देख लो ये मैच” गुम्मन मियाँ ने कहा “आपकी उम्र के भी बहुत लोग देखते हैं आजकल |”

“अजी नही गुम्मन मियाँ” किशोरीलाल जी ने कहा “हमारे शर्माजी हमेशा कहते थे की काम वही करो जो करने के लिए पैदा हुए हो | ये टेक्नोलोजी वेक्नोलोजी हम लोगों के बस की बात नही | बेटा अमरीका पढ़ता है उनका फिर भी कोई चोंचले नहीं हैं उनके |”

फिर उस दुकान से बाहर निकल कर किशोरीलाल जी आगे बढे | उनके सामने कुछ कोलेज के लडके अपनी मोटरसाईकिल को दौडाते हुए निकल गए | वह मोटरसाइकिल भी दिखने में कोई अग्निदूत ही लग रही थी | और आज कल के लौंडे उसे मोटरसाइकिल भी कहाना पसंद नही करते | सभी लोग सड़क पर अपने अपने मोबाइल से बात करते हुए दिखाई दे रहे थे | ऐसा लग रहा था जैसे सभी ने कोई बड़ी गलती की हो और सब ही अपना एक कान पकड़ कर खड़े हो | कोई कोई मोटरसाइकिल वाला भी मोबाइल पर बात कर रहा था | इसी कारण तो इनके एक्सीडेंट होते हैं | लेकिन ये सुधरेंगे थोड़े ही |

फिर चलते हुए किशोरीलालजी एक किताबों की दुकान में गए | यह दुकान कईं बरसों से यहां थी | अब उसी के पास एक बड़ा बुकस्टोर खुल गया | किशोरीलाल जी वहां भी एक बार गए थे | वहां उन्होंने नए पीढी के लडके लड़कियों को किताबों में डूबे हुए देखा | इन लोगों ने अपने स्कूल के दिनों में तो कभी किताबों को हाथ भी नही लगाया होगा | अब इंटेलेक्चुअल ढोंगी बन कर अपने आपको बहुत ज्ञानी साबित करना चाहते हैं | महंगे महंगे अंग्रेजों के लिखे गए उपन्यासों को खरीद कर ये दिखाना चाहते हैं की इन्हें साहित्य से कितना प्यार है |

इसी कारण किशोरीलालजी को अपनी उसी पुरानी दुकान से किताबें खरीदना अच्छा लगता है | उन्होंने कुछ पुरानी दर्शन शास्त्र की किताबें खरीदी और आगे बढ़ गए |

उनके पीछे एक कार आ रही थी और लगातार होर्न मारे जा रही थी | उन्होंने उसे रास्ता दिया लेकिन फिर भी वह कार उनके पीछे ही रही | जब उन्होंने झुंझलाकर पीछे देखा तो उस कार में बैठे व्यक्ति को देख कर उनके चेहरे पर मुस्कराहट आ गई |

“शर्माजी” किशोरीलालजी ने कहा |

“कैसे हो किशोरीलाल ?” शर्माजी ने कहा “आओ, अन्दर बैठो |” कहते हुए उन्होंने अपनी कार का दरवाज़ा खोला और किशोरीलाल जी अन्दर बैठ गए |

“कैसे हो?” शर्माजी ने कहा “कैसे कट रहे हैं रिटायरमेंट के दिन?”

“बस आपकी कृपा है” किशोरीलाल जी ने कहा |

“अरे भाई अब मैं तुम्हारा बॉस नही हूँ” शर्माजी ने कहा “अब तो ऐसी बातें ना करो |”

किशोरीलाल जी मुस्कुराने लगे |

“और आपके घर में सब कैसे हैं?” किशोरीलालजी ने पूछा “बेटा ठीक है अमरीका में?”

“हाँ सब ठीक है” शर्माजी ने कहा “अब तो उसका बेटा भी हो गया है | एक साल का है | एकदम अंग्रेज़ दिखता है |”

“अच्छा?” किशोरिलालजी बोले “क्या अभी उन लोगों का आना हुआ था क्या यहाँ?”

“नही नही” शर्माजी ने कहा “वो कहां आएगा | अब तो तीन साल हो गए उसको यहाँ आये हुए |”

“तो फिर आपने उनके बेटे को कहाँ देखा ?” किशोरीलाल जी ने चौंक कर पूछा |

“अरे इंटरनेट पर” शर्माजी ने कहा |

“क्या?” किशोरीलालजी बोले “आप भी ? आप तो हमेशा कहते थे की ये ये टेक्नोलोजी वेक्नोलोजी हम लोगों के बस की बात नही…”

सुनकर शर्माजी ठहाका मार कर हंस पड़े |

“अरे हां मैं कहता था” उन्होंने कहा “लेकिन क्या करें, बेटे को देखने के लिए सब करना पड़ा |”

“लेकिन कैसे?” किशोरीलाल जी ने कहा “आपने उसे देखा कैसे?”

“अरे उसके पास जो लेपटोप है उसमे एक कैमरा लगा हुआ है और यहाँ हमने भी कम्प्युटर लेकर उसमे एक कैमरा लगा दिया | अब वो हमें देख सकता है और हम उसे |”

“अरे वाह” किशोरीलाल जी ने कहा “दुनिया कहाँ की कहाँ पहुँच गयी |”

“अरे नही किशोरीलाल” शर्माजी ने कहा “दुनिया तो अपनी ही रफ़्तार से चल रही है | हम ही हैं जो रुक जाते हैं |”

“मेरी भी एक भतीजी है मुंबई में” किशोरीलाल जी ने कहा “वह भी मुझसे अक्सर कहती रहती है की इंटरनेट से बात करते हैं | मैं तो उससे कह देता हूँ की अब हमें तो इतना समझ नही आता है |”

“अरे बहुत आसान है | इन्हें सीखने के लिए किसी टेक्नीकल ज्ञान की जरूरत नही है | बस पढ़ना लिखना आना चाहिए | जो पढ़ा लिखा है वह सब कुछ चला सकता है | सारी चीज़ें इतनी आसान है की बस इंस्ट्रकशंस पढो और शुरू हो जाओ |”

सुनकर किशोरीलाल जी हां में सर हिलाने लगे |

वे कुछ देर शर्माजी से बात करते रहे | फिर शर्माजी ने उनको उनके घर के बाहर गली में छोड़ दिया |

“अरे अन्दर आइये ना शर्माजी” किशोरीलाल जी ने कहा “शान्ति के हाथ की चाय पी के जाइएगा |” और मन में उन्होंने सोचा की उनकी पत्नी उनके सीरियल के बीच में किसी महमान के आ जाने से कितनी चिढेंगी |

“फिर कभी आऊँगा, अभी कुछ काम है” शर्माजी ने कहा और फिर वे आगे चले गए |

शर्माजी के जाने के बाद किशोरीलालजी सोच में पड़ गए | सारा ज़माना बदल रहा है | बस हम ही नही बदल रहे | उन्होंने अपने हाथ में पड़ी दर्शन शास्त्र की एक किताब खोली तो उसमे पहले ही पन्ने पर लिखा था: “संसार में केवल एक ही चीज़ नहीं बदलती और वह है बदलाव |”

किशोरीलाल जी के मुख पर मुस्कराहट आ गयी | यदि इस प्रकार बहाव के साथ जीना ही ज़िंदगी है तो यही सही, उन्होंने सोचा |

सामने एक कार्ड और गिफ्ट्स की दुकान थी | उसमे बाहर ही एक बुज़ुर्ग जोडी की तस्वीर वाला एक कार्ड पडा था | यह कार्ड उन्ही की उम्र के लोगों के लिए था जो वे अपने जीवन साथी को दे सकते थे |

किशोरीलाल जी ने आगे बढ़ कर वह कार्ड उठाया | उस पर लिखा था “ज़िंदगी के हर कदम पर मेरे साथ रहने के लिए मेरी और से तुम्हे एक प्यारा सा तोहफा”

ऐसा ही कुछ शान्ति के सीरियल में बूढ़े दादा दादी ने भी एक दूसरे से कहा था | ये आम आदमी के जज्बातों से बिज़नेस कैसे किया जाता है कोई आज की पीढी से सीखे |

किशोरीलाल जी उस दुकान में घुसे | उस दुकान में बहुत भीड़ थी | सभी लोग टीवी से चिपके हुए खड़े थे | किसी को और किसी बात का होश ही नही था | टीवी पर क्रिकेट का मैच आ रहा था | किशोरीलाल जी को वह कार्ड पकडे देख कर आखिरकार एक लड़का आगे आया |

“हाँ अंकल” उसने कहा |

“बेटा ये कार्ड कितने का है?”

“चालीस रुपये का अंकल”

“ठीक है” किशोरीलाल जी ने कहा “इसे एक लिफाफे में डाल दो”

“जी” कहकर वह लड़का उस कार्ड को एक लिफाफे में डालने लगा और किशोरीलाल जी अपने पर्स से रुपये निकालने लगे |

उन्होंने वह रुपये उस लडके को दिए | वह रुपये लेकर वह लड़का फिर से टीवी की ओर मुड़ा तब किशोरीलाल जी ने कहा

“बेटा”

“जी अंकल?”

“ये… स्कोर क्या हुआ है?”